Saturday, August 19, 2017

Kuchh rishte bun jaun

कुछ रिश्ते बुन जाऊं 
आज भी याद है  मेरा बचपन मुझको
अम्मी ने कुछ तो बुना था 
उंगलियों में एक रंग का 
एहसास सा लिपटा था 
उलझता घूमता यूंही 
उनके हाथों से कुछ अच्छा ही बना था 
शायद कोई रिश्ता था 
जो बड़ी  मुश्किल से सुलझा था 

एक दिन सोचा कुछ मैं भी सुलझाऊं
मैं भी एक अपना सा, 
रिश्ता बुन जाऊं 
फिर कुछ रंग के एहसास जुटाए 
लिपटकर अपनी उंगलियों में 
मैंने भी उसे घुमाए  
सुलझना था, पर ना जाने क्यूं 
वो उलझ सा गया 
बड़े ही नाज़ुक़ थे धागे 
तो मैं सहम सा गया 

पर हारा नहीं,
फिर से एक एहसास लिया 
छुपे थे  सारे रंग जिसमें
वो सफ़ेद शफ़्फ़ाफ़ लिया 
फिर एक सादा रिश्ता तैयार हुआ 
जिसे मैंने, मेरे ही नाम किया  
इस बार मुझे एक बात समझ आई 
हर रिश्ते की होती है अलग बुनाई 

समझ सको, 
तो आप भी एक काम करना 
जहाँ छन जाएं शिकवे गिले 
ऐसा ही कुछ नाम बुनना 

                                              "आवाज़"










4 comments:

  1. Bina kuchh kahe kaise yahan se guzar jaaun, no wayz...
    Aur bunaai bhi aisi ki, bina shagaf ke...ehsaas se bhara.

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  2. kitne khubsoorat ehsaas hain rishton ki bunawat ke, dil ki gehraiyon ko chhu gaye

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  3. Bilkul sach kahan...humein Urdu seekhane ko bhi mil jaati hai

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