Monday, October 29, 2018

किताब-ए-दिल

पलकें झुका लोगी, तो किताब-ए-दिल कैसे पढ़ पाऊंगा 
सवालात जो मन में हैं, उनके जवाबात कैसे जी पाऊंगा 

हया कहूं, अदा कहूं, या सितम-ए-हुस्न मान लूं इसे 
जुंबिश-ए-लब भी ना हुई, तो ग़ज़ल कैसे लिख पाऊंगा 

आइना सा लगता है कभी कभी ये तेरा चेहरा मुझे 
दिल के अरमानों की झलक देखूंगा तो मर जाऊंगा 

गेसू, ये जो तेरे तूने क़ैद कर रखे हैं, घटा से हैं 
खुल के बिखर जाएं तो मैं खुद ही बरस जाऊंगा 

आहटें तेरे क़दमों की, रूह तक दस्तक दे जाती हैं 
दो क़दम तुम चलीं, तो क़सम से मैं दौड़ जाऊंगा 

डर है तुम्हें, सब्र का दामन ना छूट जाए मुझसे 
तुम यक़ीं को थामे रखना, मैं हौसला बन जाऊंगा 

दास्तान-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ ही ग़ज़ल है "आवाज़"
तू न मिली मुझको, तो मैं नज़्म ही लिख जाऊंगा 

                                                                      "आवाज़"

स्याह दिल


 सुर्ख़ था  जब तलक, तेरा ही अक्स उभरता था 
अब स्याह दिल पर ज़ुल्फ़ों का साया नहीं बनता

हद-ए-निगाह में अब  सिर्फ़ धुंआ धुआं सा है 
इस धुंध में कोई तस्वीर, कोई चेहरा नहीं दिखता 

इक मैंने, दामन का इक सिरा तुमने गर थामा होता 
तो फिर हाथों से चाहत का यूं आंचल नहीं फिसलता 


 अगर तू वाक़िफ़ होता, मिज़ाज-ए-इश्क़ मेरे 
तो तेरे हुस्न का अंदाज़, यूं बदला सा नहीं मिलता 

इक दर्द, इक टीस जो उभरता है तन्हा रातों में 
तो बच्चा सा ये दिल भी, बिना मचले नहीं रहता 

ये  दिल है हुज़ूर, ये कोई अदालत नहीं है 
यहां इश्क़ भी अपनी दलीलें नहीं सुनता 

 ख़ुद ही ख़ुद को क्या इल्ज़ाम दूं ऐ 'आवाज़'
 दो क़दम भी वो चलता, तो रास्ता धुंधला नहीं रहता 

                                                     'आवाज़'