Thursday, July 27, 2017

umar badh rahi hai...

उम्र बढ़ रही है... 

उम्र बढ़ रही है और घटने लगा हूँ मैं 
धीरे धीरे किश्तों में बंटने लगा हूँ मैं 
मुड़ के देखूं तो खुद में सिमटने लगा हूँ मैं 
सामने कल है जिससे लिपटने लगा हूँ मैं 

अब मैं, मैं न रहा किसी की अमानत हूँ मैं 
खुद की सोचूं तो जैसे, खयानत करने लगा हूँ मैं 
आइना भी अब झूठ बोलने से कतराने लगा है 
कहता है हर रोज़ नया चेहरा पहनने लगा हूँ मैं 

ख्वाहिशों का क्या, अधूरी हों तो भी साथ रह लेंगी 
ख़ुशी इसकी है, कि सबकी उम्मीदों पे खरा उतरने लगा हूँ मैं 
इबादतों में अब हर बार खुदा से बस यही  कहता हूँ  
यह जो अपने हैं उनके  बिछड़ने से डरने लगा हूँ मैं 

बूंदें पड़ते ही पेशानी पर, खोने लगा हूँ  मैं
इस भीगी बरसात में, यादों को ओढ़ने लगा हूँ मैं 
तुम भी आ जाओ कुछ पल  के लिए साथ मेरे 
दरीचे की सिम्त अँधेरे में, तुम्हें टटोलने लगा हूँ मैं 

उम्र बढ़ रही है और घटने लगा हूँ मैं 
धीरे धीरे किश्तों में बंटने लगा हूँ मैं 
                                                     - "आवाज़"


Thursday, March 9, 2017

Zuban ye meri...


जुबां ये मेरी फिसलती बहुत है 
हवा मिले ना मिले सुलगती बहुत है
जुबां ये मेरी फिसलती बहुत है 


कोशिशें हर बार की, कि कुछ मीठा कह जाऊं 
कुछ ऐसा हो मुझसे, कि मैं सबको भा जाऊं  
मगर कुछ  न कुछ मिलावट हो ही जाती है 
 फिर सारी मेहनत, यूं ख़ाक में मिल जाती है 
जुबां ये मेरी फिसलती बहुत है 


ऐ जुबां, तू तो ज़ायक़ा समझती है  
फिर कड़वा और मीठे में धोखा क्यूं है
कुछ तो  ख़बर होगी तुझको भी 
फिर बेख़बर होकर दिल का तोड़ना क्यूं है 
जुबां ये मेरी फिसलती बहुत है 


सोचता हूं, मामला ज़ायके का है 
या फिर ज़माना ही बदल गया 
कहीं मीठे का मतलब अब 
कड़वा तो नहीं हो गया 
अगर ऐसा  है तो ज़ुबां, तू बेफिक्र हो जा
बदलेगा ज़माना,  तू बस ज़िक्र में लग जा 

फिर मैं कभी ये ना कहूंगा 

जुबां ये मेरी फिसलती बहुत है 
हवा मिले ना मिले सुलगती बहुत है


"आवाज़" 

Wednesday, March 8, 2017

Shukriya

चाहता हूं शुक्रिया उनका अदा करता चलूं
चाहता हूं शुक्रिया उनका अदा करता चलूं 
जिनके हाथों संवरा  हूं, सुलझा हूं मैं 
उलझी राहों की ठोकरों से बच बचकर मैं 
जिनकी उंगली पकड़ कर संभाला हूं, समझा हूं मैं 
वो माँ हैं, बहनें, बीवी, बेटी, दोस्त हैं मेरी 
चाहता हूं शुक्रिया उनका अदा करता चलूं 

चाहता हूं हक़ अपना भी अदा करता चलूं  
बच्चे की तरह माँ को दुलारता चलूं 
प्यार से बहनों को भी पुकारता चलूं  
अपनी ज़िन्दगी के हिस्सों को सवांरु और फिर
साथी तेरे क़दमों से क़दम को मिलाता चलूं
चाहता हूं शुक्रिया उनका अदा करता चलूं 

ज़िन्दगी में मेरी, हर रिश्ते का अपना मक़ाम है 
किसी की सुबह है, दिन है तो किसी की शाम है 
प्यार अनमोल है, मोल इसका, न था, न होगा कभी 
सारे अपने हैं, यही अपनापन मेरा अरमान है 
अरमानों के पीछे, हर ग़म को यूंही भुलाता चलूं 
चाहता हूं शुक्रिया उनका अदा करता चलूं 

"आवाज़" 




Thursday, March 2, 2017

Lafz na de sath toh....

लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 
साज़ बिना आवाज़ का हर अंदाज़ अधूरा है 
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 

अंजाम की क्या सोचें अगर आग़ाज़ अधूरा है 
कभी मतला अधूरा है, कभी मकता अधूरा है 
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 

वरक़ पलटे ग़ज़ल की तो ये अंदाज़ कहता है 
कोई मुस्कुराया है, फिर क्यों ये संसार अधूरा  है 
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 

आफ़ताब न हो मद्धम तो माहताब अधूरा है
रात अधूरी है, रातों का हर ख़्वाब अधूरा है  
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 

पायल जो न छनके तो हर राग अधूरा है 
इश्क़ के अफ़साने का हर बाब अधूरा है 
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है
  
कल खो गया जो यार मेरा तो आज अधूरा है  
साज़ बिना आवाज़ का हर अंदाज़ अधूरा है 
जो लफ्ज़ न दे साथ तो हर साज़ अधूरा है 

"आवाज़"
 


Tuesday, February 28, 2017

Allah tu mujhko...

अल्लाह तू मुझको... 
अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे 
छिन गई जो मुझसे, वो दौलत लौटा दे
 अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे 

अम्मी को उनकी खुशियां 
 सर का मेरे साया लौटा दे 
खिलौनो की नहीं अपनों की ख़्वाहिश रही मुझे 
अपनों के संग वो हँसता घर-आँगन लौटा दे  
अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे 


चमकती सी जो दिखती थी, सितारों भरी रातें 
शबनम से नम, सुबह वाला बिस्तर लौटा दे 
सूरज की किरणें जो कभी छेड़ती थी हमें 
अम्मी की डांट से भरे वह लम्हें लौटा दे 
 अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे

 खुले आँगन में वो जलता हुआ चूल्हा लौटा दे 
लकड़ी के तिनकों में गुथा, वह पकौड़ा दिला दे 
सूप में फटके चावल, गेंहूं  की आवाज़ हो जहां 
दुनिया सा लगता हुआ वो मोहल्ला लौटा दे 

 अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे 

सर्दियों की धूप जब दिन भर  ईद सी दिखती थी 
मोहल्ले की औरतें, स्वेटर की एक्सहिबिशन लगाती थीं 
खेल-कूद छोड़-छाड़ कर, बार बार जो अम्मी बुलाती थीं 
कभी स्लीव्स तो कभी कमर से लंबाई नापती थीं 
मोहल्ले की वो हलचल, धूप की क़िस्मत लौटा दे 


अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे 
छिन गई जो मुझसे, वो दौलत लौटा दे
 अल्लाह तू मुझको, मेरा बचपन लौटा दे 

"आवाज़"

 

Thursday, February 23, 2017

Ye sochata hun

यह सोचता हूं अक्सर... 
यह सोचता हूं अक्सर, उस शख्स का 
यह एहसान कैसे चुकाऊं मैं 
मुझे, मुझसे ही प्यार करना सिखा दिया उसने 
यह उसको कैसे समझाऊं  मैं 
मेरे ही दिल की धड़कनें सुनाकर उसने 
मुझको ही मेरी आवाज़ का दीवाना बना दिया 
यह उसको कैसे बतलाऊं मैं 

यह सोचता हूं अक्सर...

 दूर रहकर भी हम  पास हैं, पर डर लगता है 
पास आकर खो न जाऊं मैं
यादों के उस लम्हें में जाकर,  दिल पूछता है 
चंद खुशियों को ले जाऊं मैं 
ज़िन्दगी भी मुझसे कहती है अक्सर, तुझे चाहने के लिए 
मुझे तेरी ज़रुरत भी नहीं 
यह क्या रस्म-इ-उल्फ़त है "आवाज़", उस तक जाऊं 
फिर भी टकरा के लौट आऊं मैं 


यह सोचता हूं अक्सर, उस शख्स का 
यह एहसान कैसे चुकाऊं मैं 
यह सोचता हूं अक्सर...
"आवाज़"

Wednesday, February 15, 2017

khwahishein unki bhi thi...

ख्वाहिशें उनकी भी थीं...


ख्वाहिशें उनकी भी थीं कि अपनी कहें 
इक़रार मेरा भी था कि उनकी सुनें 
पर फासला मीलों का होता, तो तय कर लेता 
दिल की दूरियां हैं, अब क्या कहें किसकी सुनें 
ख्वाहिशें उनकी भी थीं...

ऐसा भी नहीं की दूरियों का अब इलाज नहीं 
ये भी ग़लत होगा गर कह दूं, दिल में कोई राज़ नहीं 
चलो राज़ को अब फ़ाश करें, इश्क़ का फिर से आग़ाज़ करें 
इसी लम्हा, इज़हार करें फिर धड़कनों को परवाज़ करें 
ख्वाहिशें उनकी भी थीं...

जी चाहता है अब, ख़ुद को परिंदा परिंदा बना लूं 
आकाश को छू लूं, बादल को तेरा रिदा बना लूं 
सर पर सजा कर, तेरे हुस्न को आज उजला बना दूं 
एहसास को जगा दूं तेरेतुझे फिर से ज़िंदा बना लूं 

ख्वाहिशें उनकी भी थीं कि अपनी कहें 
इक़रार मेरा भी था कि उनकी सुनें
ख्वाहिशें उनकी भी थीं...

"आवाज़"


khayalon ko ab humne...

ख्यालों को अब हमने

ख्यालों को अब हमने उड़ना सिखा दिया है 
नज़रों को अब दिल का परिंदा बना दिया है 
अब कुछ भी देखेंगे, तो उंचाईंयां गवाही देंगी 
मौत सी सोयी सोच को हमने ज़िंदा बना दिया
ख्यालों को अब हमने उड़ना सिखा दिया है 

जुबां है, कई बार कह के मुकर भी जाय किए हैं 
दिल है जिसने वादों में जां को दाव पर लगा दिए हैं 
हम भी निभाएंगे अपनी कही और सुनी को, देख लेना 
जियेंगे उनको हम, जितने भी इक़रार दोनों ने किए हैं  
ख्यालों को अब हमने उड़ना सिखा दिया है 

एक दिन था ख्यालों ने भी घुटन में गुज़ारें हैं 
इरादे ने भी मिलन को आज-कल में टाले हैं 
यूँ ही इंतज़ार ने कर दिया बेबस रिश्ते को 
हमने ही की पहल, हम ने ही फिर हल निकाले हैं 

और ख्यालों को अब हमने उड़ना सिखा दिया है 
और नज़रों को अब दिल का परिंदा बना दिया है
ख्यालों को अब हमने उड़ना सिखा दिया है 

"आवाज़"